गढ़वाली साहित्यकार गजेंद्र नौटियाल को ‘चार रेखड़ा’ कृति पर उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान


भवानी दत्त थपलियाल पुरस्कार से होंगे सम्मानित, 40 वर्षों के शोध पर आधारित है कृति

देहरादून/टिहरी गढ़वाल | रिपोर्ट

Gajendra Nautiyal, उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार, रचनाकार एवं शोधकर्ता, को उनकी गढ़वाली कथा-कृति ‘चार रेखड़ा’ के लिए उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान के अंतर्गत प्रतिष्ठित भवानी दत्त थपलियाल पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान 30 मार्च को उत्तराखंड भाषा संस्थान द्वारा प्रदान किया जाएगा। इस सम्मान के तहत ₹1,00,000 की धनराशि, सम्मान चिन्ह, सम्मान पत्र एवं अंगवस्त्र प्रदान किया जाएगा।

‘चार रेखड़ा’ : लोकजीवन और सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज

‘चार रेखड़ा’ उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों की 11 लोक कथाओं का संग्रह है। “चार रेखड़ा” का अर्थ जीवन की चार रेखाएं होता है। यह कृति लगभग 40 वर्षों के शोध और अनुभव पर आधारित है, जिसमें गांव के परिवेश, संस्कृति, भाषा और सामाजिक संरचना को गहराई से उकेरा गया है। किताब की प्रमुख कहानी जातिवाद और छुआछूत जै  से सामाजिक मुद्दों को दर्शाती है, जिसमें एक ढोल वादक समाज की परंपरागत सीमाओं को तोड़ने का प्रयास करता है। यह कहानी सामाजिक बदलाव और संघर्ष का प्रतीक मानी जा रही है। साहित्यकारों के अनुसार, इस संग्रह में ठेठ ग्रामीण जीवन, स्थानीय पात्रों और विलुप्त होते शब्दों एवं मुहावरों का सजीव चित्रण इसे विशेष बनाता है।

पत्रकारिता और शोध में महत्वपूर्ण योगदान

टिहरी गढ़वाल जनपद के ग्राम सेमल्थ निवासी गजेंद्र नौटियाल ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत अमर उजाला (अंजनीसैंण) से की। इसके बाद उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं में कार्य करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई।इसके अलावा उन्होंने ढोल सागर, पहाड़ के विलुप्त होते वाद्य यंत्र, नुक्कड़ नाटक और लोकसंस्कृति पर व्यापक शोध कार्य किया है, जिसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। वह सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय हैं और वर्तमान में बच्चों के अधिकारों के लिए कार्य करते हुए Kailash Satyarthi के साथ जुड़कर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

गजेंद्र नौटियाल का मानना है कि आज की पीढ़ी पारंपरिक शब्दों और लोक अवधारणाओं से दूर होती जा रही है। उनकी यह कृति इन मूल्यों और परंपराओं को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है। उनका साहित्य सामाजिक बदलाव, सांस्कृतिक संरक्षण और लोकजीवन की वास्तविकताओं को सामने लाने का कार्य करता है।

युवा पीढ़ी पर प्रभाव

नौटियाल ने विभिन्न सामाजिक और शैक्षिक परियोजनाओं के माध्यम से युवाओं को लेखन, मीडिया और रचनात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ा है। उमंग जैसे प्रोजेक्ट के जरिए उन्होंने कई युवाओं को लेखन, पत्रकारिता, रेडियो और रचनात्मक कला की दिशा में मार्गदर्शन दिया है।

गढ़वाली भाषा और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में गजेंद्र नौटियाल का योगदान उल्लेखनीय रहा है। ‘चार रेखड़ा’ जैसी कृतियां न केवल साहित्य को समृद्ध करती हैं, बल्कि समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य भी करती हैं।


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